हिन्दी को सम्पर्क भाषा, आम अवाम की ज़रूरतों की भाषा के रूप में स्वीकार किया जा रहा है लेकिन राजभाषा के रूप में आज भी विरोध हो रहा है, कारण कि ‘राजभाषा’ कहते ही ‘राज चलाने की भाषा’ के रूप में उसे ग्रहण किया जाता है। वहीं केन्द्र में भी हिन्दी अनुवाद के बूते पर चलती है, जिसमें उसकी क्लिष्टता के कारण वह आम अवाम की समझ में नहीं आती है। वास्तविकता यह है कि वह अपनी प्रयोजमूलकता से कोसों मिल दूर होती है। मंत्रियों से लेकर सरकारी अधिकारियों तक अंग्रेज़ी में काम करते हैं और मंचों से, टीवी चैनलों पर बोलते हुए भी अंग्रेज़ी का प्रयोग करते हैं। ऐसे में हिन्दी को राजभाषा के रूप में लादना यथोचित नहीं जान पड़ता। इस बात तमिलनाडु केन्द्रीय विश्वविद्यालय, तिरुवारूर में 26-28 जुलाई, 2012 को ‘दक्षिण भारत में हिन्दी’ विषय पर आयोजित त्रिदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में उभरकर आयी।